बाबा साहब का छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष

अंबेडकर ने कहा था छुआछूत गुलामी से भी बदतर है अंबेडकर बड़ौदा के रियासत राज्य द्वारा शिक्षक तथा उनकी सेवा करने के लिए बाध्य थे उन्हें महाराज गायकवाड का सैन्य सचिव नियुक्त किया गया लेकिन जातिगत भेदभाव के कारण कुछ समय में उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी उन्होंने इस घटना को अपनी आत्मकथा वेटिंग फॉर पिज़्ज़ा में वर्णित किया इसके बाद उन्होंने अपने बढ़ते परिवार के लिए जीविका साधन खोजने के पुनः प्रयास किए जिसके लिए उन्होंने लिखा कर के रूप में एक निजी शिक्षक के रूप में भी काम किया और एक निवेश परामर्श व्यवसाई की स्थापना की किंतु वे सभी प्रयास तक विफल हो गए जब उनके ग्राहकों ने जाना कि आज चौथ है 1918 में यह मुंबई में सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोसेसर बने हालांकि
वे छात्रों के साथ सफल रहे फिर भी अन्य प्रोफेसर रूम ने उनके साथ पानी पीने के बर्तन साझा करने पर विरोध किया

भारत सरकार अधिनियम 1916 तैयार कर रही साउथ खबरों समिति के समक्ष भारत के प्रमुख विद्वान के तौर पर आंबेडकर को साक्ष्य देने के लिए आमंत्रित किया गया इस सुनवाई के दौरान अंबेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिए प्रथम निर्वाचित और आरक्षण देने की वकालत की 1920 में मुंबई से उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरुआत की यह प्रकाशन शीघ्र ही पाठकों में लोकप्रिय हो गया बाबा अंबेडकर ने इसका प्रयोग रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं पर जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनीतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिए किया उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिए गए भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानिक शासक साहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया जिनका अंबेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज में हलचल मचा गया

मुंबई हाई कोर्ट में विधि का अभ्यास करते हुए उन्होंने और जूतों की शिक्षा को बढ़ावा देने और उन्हें ऊपर उठाने के प्रयास किए उनका पहला संगठित प्रयास केंद्रीय संस्थान बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना था जिनका उद्देश्य शिक्षा और सामाजिक आर्थिक सुधार को बढ़ावा देने के साथ ही

आओ सदा ग्रस्त वर्गों के रूप में संदर्भित भाई इस कार के कल्याण करना था दलित अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने मूकनायक, भाहिष्कृत भारत समता , प्रबुद्ध भारत और जनता जैसी पांच पत्रिकाएं निकाली सन 1925 में उन्हें मुंबई प्रेसिडेंट समिति में सभी यूरोपीय सदस्यों वाले साइमन कमीशन के काम करने के लिए नियुक्त किया गया इस आयोग के विरोध में भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुए जहां इसकी रिपोर्ट को अधिकतर भारतीयों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया अंबेडकर ने अलग से भविष्य के संविधानिक सुचारू के लिए सिफारिश लिखकर भेजें


विजय स्तंभ ओ कोरेगांव भीमा के डॉ बाबासाहेब आंबेडकर एवं उनके अनुयाई 1 जनवरी 1927 द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध के अंतर्गत 1 जनवरी 1818 को हुई कोरेगांव की लड़ाई के दौरान मारे गए भारतीय महार सैनिकों के सम्मान में अंबेडकर ने 1 जनवरी 1927 को कोरेगांव विजय स्मारक में एक समारोह आयोजित किया यहां महर समुदाय में यहां महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के शिलालेख पर खुद बाय गए तथा कोरेगांव को दलित स्वाभिमान का प्रतीक बनाया

सन 1927 तक डॉक्टर अंबेडकर ने छुआछूत के विरुद्ध एक बार पार्क एवं सक्रिय आंदोलन आरंभ करने का निर्णय किया उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों सत्याग्रह और जुलूस के द्वारा पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी वर्गों के लिए खुलवाने के लिए साथ ही उन्होंने अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया उन्होंने मार शहर में अचूक समुदाय को भी शहर की 14 तालाबों से पानी लेने का अधिकार दिलाने के लिए सत्याग्रह चलाया

1927 के अंत में सम्मेलन में अंबेडकर ने जाति भेदभाव और छुआछूत को वैचारिक रूप से न्याय संगत बनाने के लिए प्राचीन हिंदू पार्ट मनुस्मृति जिसके कई पद खुलकर जातीय भेदभाव हुआ जातीय बात का समर्थन करते हैं की सार्वजनिक रूप से निंदा की और उन कि सार्वजनिक और उन्होंने औपचारिक रूप से प्राचीन पाठ की प्रतियां जलाई 25 दिसंबर 1927 को उन्होंने हजारों मनुष्य पतियों के नेतृत्व में मनुस्मृति की प्रतियां को जलाया इस इस की स्मृति में प्रतिवर्ष 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस के रूप में अंबेडकर वादियों और हिंदू दलित द्वारा मनाया जाता है इनो से 30 1930 में अंबेडकर ने 3 महीने की तैयारी के बाद कालाराम मंदिर सत्याग्रह शुरू किया काला राम मंदिर आंदोलन में लगभग 15006 सेवक इकट्ठे हुए जिससे नाशिक के सबसे बड़ी प्रक्रिया हुई जुलूस का नेतृत्व 10 बैंड ने किया था स्काउट्स का एक पेज महिलाएं और पुरुष पहली बार भगवान को देखने के लिए अनुशासन आदेश और दृढ़ संकल्प में चले गए थे जब वे द्वार तक पहुंचे तो द्वार ब्राह्मण अधिकारियों द्वारा बंद कर दिए गए |